राजनीति का एक अंदाज यह भी
संजीव कुमार
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी राज्य का मुख्यमंत्री केंद्र सरकार के सौतेले व्यवहार के खिलाफ संसद के सामने धरने में शामिल हुआ हो। हाल ही में केरल के मुख्यमंत्री का यह निराला अंदाज सामने आया
अमूमन जंतर-मंतर पर आम भारतीय नागरिक ही अपनी मांगों को लेकर धरना-प्रदर्शन किया करते हैं। लेकिन अगर किसी राज्य का मुख्यमंत्री आम आदमी की कतार में खड़ा होकर धरना-प्रदर्शन करे तो इसे एक राजनीतिक स्टंट नहीं तो और क्या कहा जाएगा?
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी राज्य का मुख्यमंत्री केंद्र सरकार के सौतेले व्यवहार के खिलाफ संसद के सामने धरने में शामिल हुआ हो। हाल ही में केरल के मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन ने केरल के वामपंथी विधायकों, सांसदों और सीपीआई-सीपीएम नेताओं के साथ जंतर-मंतर से संसद तक केरल के प्रति केंद्र की उदासीनता के विरोध में मार्च किया तथा धरना दिया। साथ ही केंद्र सरकार पर राज्य के प्रति उदासीन रवैया अपनाने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि केंद्र सरकार राज्य की जरूरत के अनुसार सरकारी फंड उपलब्ध नहीं कराती।
इस धरने को केरल के मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन सहित अनेक वामपंथी नेताआें ने संबोधित किया। सीपीआई (एम) के महासचिव प्रकाश करात का कहना था कि शक्ति की केंद्रीयता केंद्र के पक्षपातपूर्ण रवैये से साफ दिखाई पड़ती है। केरल के संदर्भ में एक नया केंद्र-राज्य संबंध दिखाई देता है। वहीं केरल के मुख्यमंत्री अच्युतानंदन का कहना था कि केंद्र केरल के साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार कर रहा है। राज्य की आवश्यकताओं को पूरा करने मेें केंद्र सरकार कतराती है, खासकर संकटकालीन स्थितियों में। उन्होंने अपनी समस्याओं को केंद्र के सामने रखा, जिसमें गरीबी रेखा से ऊपर जीवन जीने वाले परिवारों के लिए चावल का कोटा पुन: बहाल करने, केंद्र द्वारा बिजली की आपूर्ति फिर से बहाल करने, केरल में आईआईटी की स्थापना तथा राज्य में रेलवे जोन की स्थापना जैसे मुद्दे शामिल थे।
उनका कहना था कि केंद्र सरकार वादे तो बहुत करती है, लेकिन उसे क्रियान्वित नहीं करती। दिल्ली आकर विरोध प्रदर्शन के पीछे यही कारण है। उनके अनुसार केंद्र सरकार ने पहले एपीएल परिवारों के लिए चावल कोटा 1,13,420 टन निर्धारित किया था, जिसे बाद में घटाकर 17,056 टन कर दिया गया और कुछ समय बाद तो उसे पूरी तरह बंद ही कर दिया गया। साथ ही केंद्र के द्वारा दी जाने वाली बिजली को 1188 मेगावॉट से घटाकर 667 मेगावॉट कर दिया गया है।
इस धरने में सीपीआई (एम) के नेता सीताराम येचुरी, प्रकाश करात, वृंदा करात, सीपीआई के सहसचिव सुधाकर रेड्डी, आरएसपी नेता टी.जे. चंद्रचूड़न और फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता जी. देवराजन आदि शामिल थे। धरने में केरल के मुख्यमंत्री का साथ देने वालों में उनके 16 मंत्रियों और 50 विधायकों के अलावा अनेक सांसद भी मौजूद थे।
केरल में विपक्षी कांग्रेस गठबंधन का आरोप है कि अच्युतानंदन ने यह कदम केरल में अपनी विफलता को छुपाने के मकसद से उठाया है। जब अच्युतानंदन अपने सहयोगियों के साथ यहां संसद की ओर कूच कर रहे थे, ठीक उसी समय तिरुवनंतपुरम में कांग्रेस भी एलडीएफ सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रही थी। ऐसा मुख्यमंत्री की मुहिम की हवा निकालने के लिए किया गया। कांग्रेस नेता उमन चांडी ने एलडीएफ सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि केरल में एलडीएफ सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है। इस पर पर्दा डालने के लिए उसका केंद्र पर अंगुली उठाना किसी भी तरह उचित नहीं है।
ऐसा भी कहा जा रहा है कि वाम शासित राज्यों में विकास और आम आदमी की बदहाली को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की विपक्षी तैयारियों के मद्देनजर वामदल सचेत हो गए हैं। राज्य में उन्हें हार का मुंह देखना न पड़े, इसलिए पहले ही कदम उठाते हुए उन्होंने राज्य की बदहाली के लिए केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया है। इसी रणनीति पर अमल करते हुए बीते 17 अक्टूबर को केरल के मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन ने अपने सहयोगियों के साथ संसद के सामने धरना देकर विकास की राजनीति को हवा दे दी।
बहरहाल, सत्य चाहे जो भी हो, लेकिन इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि केरल का समुचित विकास नहीं हुआ है और वहां की आम जनता अब भी बदहाली का जीवन जी रही है। आम जनता पर राजनीति करना तो हमारे राजनेताओं की पुरानी आदत है। खैर, किसी बहाने केरल की आम जनता की बदहाली का संदेश पूरे देश में गया तो अवश्य।
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